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18 वर्ष की आयु जैसे कानून में ही सुधार की आवश्यकता

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लेखिका-निवेदिता मुकुल सक्सेना सक्सेना झाबुआ मध्यप्रदेश

हाल ही में लड़कियों केविवाह की उम्र को इक्कीस कर देना का कानून में संशोधन का प्रस्ताव पारित करने हेतु रखा गया जिस पर कई वर्षों से चर्चा चल रही हैं।
गत वर्ष भी चाइल्ड कोंसर्वेटिव फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक वेबनार मे इस विषय सम्बन्धित कई कड़ियों में विभिन्न पेशो से जुड़ी महिलाओं व लड़कियों , समाजसेवीयो से चर्चा की गई व उन सभी ने इससे सम्बन्धित मत रखे । जहा तक जमीनी स्तर सेजुड़े पक्ष देखने मे आये वह इक्कीस का समर्थन इसीलिए भी नही चाहेगे क्योंकि बाल विवाह ,बाल विधि के विरोध में आंना जिसमे मुख्यतः धारा 376 से जुड़े प्रकरण का सतत बढ़ते जाना व साथ 18 से कम उम्र का अंचल में बाल विवाह के साथ ही शिक्षा से विरक्त अथार्त ड्रॉप आउट होना काफी गम्भीर व चिंतन का विषय जिसमे खासकर लड़कियों की संख्या अधिकाधिक बढ़ी वही सच ये भी देखा गया कि अब तक के कानून के अनुसार भी जब सख्ती से समाज मे रहते हुए उनका पालन नही हो पा रहा ।
कब कब हुआ परिवर्तन-आजादी के पूर्व से लगत इसमें संशोधन का प्रयास जारी रहा हैं । भारत मे शारदा एक्ट की नींव रखी गयी जिसे प्रसिद्ध शिक्षाविद ,न्यायाधीश, राजनैतिक, समाज सुधारक राय सहाब हरविलास सारदा ने इसकी शुरुआत की ।ये सत्य हैं कि इससे पूर्व भारत मे बाल विवाह एक आम सी बात थी जिसमे दस या बारह वर्ष की आयु में विवाह होना एक आम बात थी तब कई लड़कियों की प्रसव समय मृत्यु होने स्वाभाविक सी बात थी तब भी लड़का व लड़की की आयु में लम्बा अंतर पाया जाता था इस कारण लडकिया अधिकतर शिक्षा से वंचित रह जाती थी और उनकी शारिरिक रूप से भी परिपक्व नही हो पाती थी।फिर मुगल या ब्रिटिशर का भारत मे घुसपैठ हुआ तब स्त्री अस्मिता पर लगातार प्रहार हुआ करता था खासकर बालिका वर्ग में तब से पर्दाप्रथा की शुरुआत हुई और आम सी बात है स्त्री संरक्षण खतरे में आ गया था जिसमे चलते अधिकतर लोग कम उम्र में विवाह कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होने का प्रयास जारी रखने हेतु बाल विवाह होना शुरूहो गया था।
वर्तमान में इक्कीस वर्ष समस्या क्यों-कई वर्षों से ग्रामीण अंचल में निवास करते हुए व बाल कल्याण समिति और किशोर न्याय बोर्ड में कार्यरत रहते हुए ये जाना कि अंचल में अधिकतर प्रकरण धारा 376 के (बलात्कार) के सर्वाधिक पाए गए साथ ही कोरोना के बादसे इनकी संख्या के बढ़ोतरी हुई।
और ये बात से भी नकारा नही जा सकता कि इन सबका अंत आखिर में समझौते के साथ पैसे का लेनदेन कर (दापा -अथार्त वधु मूल्य) के साथ विवाह कर दिए जाते जो बाल विवाह होते ।क्योंकि अंचल में जनजातीय प्रथाएं अलग है ओर अधिकतर लडकिया जल्द ही शिक्षा से ड्रॉप आउट जाती थी।
वही लड़के भी शिक्षा जगत से दूरी बनाकर मजदूरी में लग जाते । ऐसे में कई अन्य कुप्रथाएँ बढ़ती जाती जैसे बहुविवाह बाल श्रम आदि।
अगर विवाह की आयु लड़कियों की इक्कीस वर्ष होती हैं तो निश्चित रूप से अपराध जगत में किशोरवय की हिस्सेदारी अधिक बढ़ जाएगी। बात ये नही की परिवर्तन अच्छा नही लेकिन जो हैं उनमें भी असीम सुधारात्मक सम्भावना 18 साल की आयु में बनती हैं।
वही बात करे किशोर न्याय अधिनियम की वहा पर भी इम्प्लीमेंटशन होगा लेकिन भारतीय मान्यता इसे कितना स्वीकार कर पाती हैं खासकर लड़कियों के माता पिता जो इक्कीस के पूर्व ही स्नातक करवा कर उनका विवाह कर देना उचित समझते है।
वही ख़ुश हैं लड़कियों का वह समूह जो आगे और अध्ययन कर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता है। उन्हें अब काफी समय मिलेगा ।
लेकिन अब तक का अनुभव ये हैं कि , ग्रामीण अंचल में कानून व अधिनियमो को ताख में रख बाल विवाह के बाद बाल श्रम आम सी बात है जहाँ प्रशासनिक जिम्मेदारिया मंचो से घोषणा करने की शोभा बढाने तक सीमित है ।जहाँ सरकार भी अपने स्वंय के बनाई योजनाओं को ग्रामीण अंचल में फ़लीभूत करने में सक्षम होने की संभावना कम ही रहती है। कारण भी हैं ग्रामीण अंचल अधिकतर कागजी परिणामो को ही दर्शा पाता हैं औऱ जिम्मेदार गैर सरकारी संस्थान कभी फील्ड पर सत्य आधारित डाटा व उन पर क्रियान्वयन अस्पष्ट रहता हैं । हा ये बात जरूर है कि पेपर वर्क अवश्य पूर्ण मिलेगा।
हाल ही में मैं टी वी सीरियल अहिल्या देख रही थी उसमें बाल विधवा का पुनर्विवाह करवाने में असंख्य चुनोतियो का सामना करना पड़ा । जिसे आज पूर्णतः समाज द्वारा भी स्वीकार कर लिया गया। लेकिन उस समय तो स्थितियां विकट थी जब ये शुरुआत की गई थी।
उसी प्रकार विवाह योग्य लड़कियों की उम्र में इक्कीस की बढ़ोतरी काफी चुनोती पूर्ण है तब जबकि भारत का मूल ग्रामीण अंचल हैं ।
जिम्मेदारी हमारी
*लड़कियों की वर्ष की विवाह योग्य आयु अट्ठारह में ही कई चुनोतियाँ असीम हैं।
*अट्ठारह में ही अब तक सुधार की सम्भवना हैं।

लेखिका-निवेदिता मुकुल सक्सेना सक्सेना झाबुआ मध्यप्रदेश
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