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सिंहासन बत्तीसीकहां से आया सिंहासन, कौन थीं 32 पुतलियां

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सिंघासन बत्तीसी एक लोककथा संग्रह है। गुप्तकालीन राजा विक्रमादित्य, प्रजा से प्रेम करने वाले,न्याय प्रिय, जननायक, प्रयोगवादी एवं दूरदर्शी महाराजा थे।सिंहासन बत्तीसी राजा विक्रमादित्य के अद्भुत गुणों,अदम्य साहस सौर्य का बखान करती है।
ऐसा कहा जाता है कि राजा विक्रमादित्य के सिंहासन पर 32 पुतलियां लगी हुई थीं, जो राजा भोज को सिंहासन बत्तीसी की कहानी सुनाती हैं। हर पुतली महाराज विक्रमादित्य की दानवीरता और फैसले लेने के कौशल से जुड़े किस्से राजाभोज को सुनाकर उड़ जाती हैं।
इन सभी कहानियों से बच्चों का मानसिक विकास तो होता ही है, साथ ही इनसे बच्चों को कठिन परिस्थिति में सही फैसला लेने का हौसला भी मिलता है। इन कहानियों से बच्चों को सही और गलत में फर्क करने की समझ बढती है।। साथ ही जीवन में दान और पुण्य का क्या महत्व का भी ज्ञान है। सिंहासन बत्तीसी की कहानियां बच्चों को कहानी के माध्यम से ऐसी बातें सिखा देती है , जिन्हें बच्चों को सिखा पाना आसान नहीं होता है। विक्रमादित्य का सिंहासन न्याय और धर्म का प्रतीक भी है।
चलिए, फिर विक्रमादित्य सिंहासन पर लगी पुतलियों द्वारा सुनाई गई कहानियां की शुरुआत कैसे हुई जानते है।प्राचीन समय की बात है। उज्जैन में राजा भोज नामक एक राजा राज्य करते थे। वह बड़े दानी और धर्मात्मा थे। उनके बारे में प्रसिद्ध था कि, वह ऐसा न्याय करते कि दूध और पानी अलग-अलग हो जाए। उसी नगर में एक किसान का एक खेत था। जिसमें उसने कई साग-सब्जी लगा रखी थी।
एक बार की बात है कि, खेत में बड़ी अच्छी फसल हुई। पूरी जमीन पर तो खूब तरकारियां आईं, लेकिन खेत के बीचों-बीच थोड़ी-सी जमीन खाली रह गई। हालांकि किसान ने उस जमीन पर भी बीज डाले थे। लेकिन वहां कुछ नहीं उगा।किसान ने वहां खेत की रखवाली के लिए एक मचान बना लिया। जब भी किसान मचान पर चढ़ता अपने आप चिल्लाने लगता- ‘कोई है? राजा भोज को पकड़ लाओ और सजा दो। मेरा राज्य उससे ले लो। जाओ, जल्दी जाओ।’
सारी नगरी में यह बात आग की तरह फैल गई और राजा भोज के कानों में पहुंची। राजा ने कहा, ‘मुझे उस खेत पर ले चलो। मैं सारी बातें अपनी आंखों से देखना और कानों से सुनना चाहता हूं।’
राजा भोज जब उस जगह पहुंचे तो उन्होंने भी वही देखा कि किसान मचान पर खड़ा है और कह रहा है- ‘राजा भोज को फौरन पकड़ लाओ और मेरा राज्य उससे ले लो।
यह सुनकर राजा चिंतित हो गए। चुपचाप महल में लौटा आए। उन्हें रातभर नींद नहीं आई। सवेरा होते ही उन्होंने राज्य के ज्योतिषियों और जानकार पंडितों को इकट्ठा किया। उन्होंने अपनी गोपनीय विद्या से पता लगाया कि, उस मचान के नीचे कुछ छिपा है।
राजा ने उसी समय आज्ञा दी कि उस जगह को खुदवाया जाए।खोदते-खोदते जब काफी मिट्टी निकल गई तो अचानक एक सिंहासन प्रकट हुआ। सिंहासन के चारों ओर आठ-आठ पुतलियां यानी कुल बत्तीस पुतलियां खड़ी थीं। सबके अचरज का ठिकाना न रहा। राजा को खबर मिली तो सिंहासन को बाहर निकालने को कहा, लेकिन कई मजदूरों के जोर लगाने पर भी वह सिंहासन टस-से मस न हुआ।
तब एक पंडित ने कहा कि यह सिंहासन देवताओं का बनाया हुआ है। अपनी जगह से तब तक नहीं हटेगा जब तक कि राजा स्वयं इसकी पूजा-अर्चना न करें।
राजा ने ऐसा ही किया। पूजा-अर्चना करते ही सिहांसन ऐसे ऊपर उठ आया, मानों फूलों का हो। राजा बड़े खुश हुए।
सिहांसन में कई तरह के रत्न जड़े थे ,जिनकी चमक अनूठी थी। सिंहासन के चारों ओर 32 पुतलियां बनी थी। उनके हाथ में कमल का एक-एक फूल था। राजा ने हुक्म दिया कि खजाने से रुपया लेकर सिहांसन दुरुस्त करवाएं।
सिंहासन सुंदर होने में पांच महीने लगे। अब सिंहासन दमक उठा था। जो भी देखता, देखता ही रह जाता। पुतलियां ऐसी लगती मानो अभी बोल उठेंगीं।राजा ने पंडितों को बुलाया और कहा, ‘आप लोग कोई अच्छा मुहूर्त निकालें। उस दिन मैं इस सिंहासन पर बैठूंगा।’ दिन तय किया गया। दूर-दूर तक लोगों को निमंत्रण भेजे गए। तरह-तरह के बाजे बजने लगे, महल में खुशियां मनाई जाने लगी।
पूजा के बाद जैसे ही राजा ने अपना दाहिना पैर बढ़ाकर सिंहासन पर रखना चाहा कि सारी पुतलियां खिलखिला कर हंस पड़ी। लोगों को बड़ा अचंभा हुआ कि यह बेजान पुतलियां कैसे हंस पड़ी।
राजा ने अपना पैर खींच लिया और पुतलियों से पूछा , ‘ओ सुंदर पुतलियों! सच-सच बताओ कि तुम क्यों हंसी?’
पहली पुतली का नाम था। रत्नमंजरी। राजा की बात सुनकर वह बोली, ‘राजन्! आप बड़े तेजस्वी हैं, धनी हैं, बलवान हैं, लेकिन इन सब बातों का आपको घमंड भी है। जिस राजा का यह सिहांसन है, वह दानी, वीर और धनी होते हुए भी विनम्र थे। परम दयालु थे। राजा बड़े नाराज हुए।
पुतली ने समझाया, महाराज, यह सिंहासन परम प्रतापी और ज्ञानी राजा विक्रमादित्य का है।
राजा बोले, मैं कैसे मानूं कि राजा विक्रमादित्य मुझसे ज्यादा गुणी और पराक्रमी थे?
पुतली ने कहा, ‘ठीक है, मैं तुम्हें राजा विक्रमादित्य की एक कहानी सुनाती हूं।’ सिंहासन बत्तीसी क‍ी पहली पुतली रत्नमंजरी ने सुनाई थी।
राजाभोज जितनी बार सिंहासन पर बैठने की कोशिश करता उतनी बार पुतलियाँ ह॔सने लगती ,राजा भोज गुस्से में आ जाते तो उसे राजा विक्रमादित्य के न्याय प्रिययता ,साहस और धर्म, वीरता की एक कहानी सुनाकर उड़ जाती ।इसी तरह एक एक कर बत्तीस पुतलियों ने राजा भोज को बत्तीस कहानी सुनायी,जिस कारण इस कथा संग्रह का नाम सिंहासन बत्तीसी पड़ा।

लेखिका स्नेहा दुधरेजीया पोरबंदर गुजरात
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